

मुख्य बिंदु:
- इंश्योरेंस प्रक्रिया में देरी का कारण
- ब्रोकर सिस्टम पर उठे सवाल
- बढ़ा हुआ प्रीमियम और उसका प्रभाव
- विशेषज्ञों की राय
- अधिकारिक बयान
मध्यप्रदेश के सरकारी गोदामों में पिछले 4 महीनों से 10,000 करोड़ रुपए मूल्य का अनाज, दवाइयाँ और अन्य आवश्यक वस्तुएँ बिना बीमा के रखी गई हैं। यह स्थिति वेयरहाउसिंग अधिनियम और नियामक संस्थाओं के नियमों के बिल्कुल खिलाफ है, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि अनाज एक दिन भी बिना बीमा के नहीं रखा जा सकता।
इंश्योरेंस प्रक्रिया में देरी का कारण
इस बार दो मुख्य कारणों से बीमा प्रक्रिया अटक गई। पहला, वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन ने पहली बार अनाज में नमी के नुकसान को भी बीमा के अंतर्गत लाने का निर्णय लिया। दूसरा, बीमा कंपनी और सरकार के बीच एक ब्रोकर कंपनी ‘एक्सपेरिटस इंश्योरेंस ब्रोकर्स प्रा.लि.’ को नियुक्त किया गया, जो बीमा दर तय करने और क्लेम प्रक्रिया संभालने के लिए जिम्मेदार होगी।
सितंबर-अक्टूबर 2024 में किया गया बीमा टेंडर रद्द कर दिया गया और पिछली कंपनी को जनवरी 2025 तक का एक्सटेंशन दे दिया गया। इसके परिणामस्वरूप फरवरी 2025 से अनाज बिना बीमा के पड़ा हुआ है।
ब्रोकर सिस्टम पर उठे सवाल
ब्रोकर चयन प्रक्रिया पर विवाद
ब्रोकर चयन को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं। दिसंबर 2024 में प्रेजेंटेशन देने वाली कंपनी को ही बाद में फाइनल कर लिया गया। सूत्रों के अनुसार, कॉर्पोरेशन के कुछ अधिकारियों ने इस कदम का विरोध भी किया था, लेकिन उच्च स्तर से निर्णय थोप दिया गया।
बीमा कंपनियों की स्थिति
नई टेंडर प्रक्रिया में इफको टोकियो, रिलायंस, आईसीआईसीआई और नेशनल इंश्योरेंस जैसी फर्म शामिल हुईं। इनमें से एक कंपनी का क्लेम पहले से लंबित है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।
बढ़ा हुआ प्रीमियम और उसका प्रभाव
अगर टेंडर सितंबर 2024 में रद्द न होता तो बीमा दरें कम हो सकती थीं। लेकिन जनवरी 2025 में इरडा (IRDA) ने बीमा की दरों में 2 से 3 गुना की बढ़ोतरी कर दी। पहले प्रीमियम जहां 1.61 करोड़ रुपए था, वहीं अब नमी को शामिल करने से यह 5 से 7 करोड़ तक पहुँच सकता है। जबकि अब तक किसी वर्ष क्लेम राशि 2 करोड़ से अधिक नहीं रही।
ब्रोकर का कमीशन और वित्तीय असर
ब्रोकर के शामिल होने से बीमा प्रीमियम में 10 से 20 प्रतिशत तक का कमीशन स्वतः जुड़ जाता है। बीमा कंपनी भले ही सीधे ब्रोकर को भुगतान करे, लेकिन वह राशि अंततः प्रीमियम में ही जुड़ती है, जिससे सरकार को अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। जब बीमा कंपनियाँ सीधे भाग लेती हैं, तब दरों पर मोलभाव संभव होता है।
विशेषज्ञों की राय
“नमी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन उसे बीमा शर्तों में जोड़ना दरों को बढ़ाने की चाल दिखाता है।”
— संभव सेठी, बीमा विशेषज्ञ
अधिकारिक बयान
“यह सही है कि बीमा प्रक्रिया में देरी से अनाज बिना बीमे के पड़ा है। प्रीमियम दरों में बढ़ोतरी के चलते टेंडर रद्द करना पड़ा। इस बार नमी का बीमा भी शामिल किया जा रहा है।”
— अनुराग वर्मा, एमडी, मप्र वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन
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