
इंदौर के सरकारी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में मां की किडनी से बेटे को मिला नया जीवन। तीन घंटे की सर्जरी, 10 लाख खर्च के बाद मुफ्त इलाज।

- सालों की बीमारी, लाखों खर्च और फिर सरकारी अस्पताल की आस
- मां की किडनी से मिला जीवनदान
- तीन चरणों में हुआ पूरा इलाज
- डॉक्टरों की मेहनत और टीमवर्क से हुआ सफल ट्रांसप्लांट
- अब जिंदगीभर रहेगी सावधानी की ज़रूरत
- आयुष्मान योजना बनी सहारा
- मां का आशीर्वाद, बेटे की नई शुरुआत
इंदौर | देवास निवासी 25 वर्षीय सिविल इंजीनियर सचिन वैष्णव को तीन वर्षों से किडनी की गंभीर समस्या थी। इलाज के लिए देवास से लेकर दिल्ली तक के प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ। जब परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुका था, तब इंदौर के सरकारी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल ने उन्हें नई उम्मीद दी। यहां उनकी मां ललिता वैष्णव ने किडनी दान की और सफल ट्रांसप्लांट के बाद सचिन को नई जिंदगी मिली।
सालों की बीमारी, लाखों खर्च और फिर सरकारी अस्पताल की आस
सचिन की बीमारी की शुरुआत तीन साल पहले हुई थी। किडनी की खराबी बढ़ती गई और डॉक्टरों ने IgA Nephropathy का निदान किया। परिवार ने देवास, इंदौर, अहमदाबाद और दिल्ली के महंगे प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराया, जिससे 10 लाख रुपए से अधिक खर्च हो गए।
मां की किडनी से मिला जीवनदान

जब सारे प्रयास विफल हो गए, तो सचिन को इंदौर के सरकारी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में दिखाया गया। डॉक्टरों ने उनकी मां की किडनी का मिलान किया, जो पूरी तरह फिट पाई गई। इसके बाद कानूनी प्रक्रिया और जांच के बाद ट्रांसप्लांट की अनुमति मिली।
तीन चरणों में हुआ पूरा इलाज
डॉ. विशाल कीर्ति जैन ने बताया कि यह जटिल प्रक्रिया तीन हिस्सों में विभाजित थी — प्री-ऑपरेटिव असेसमेंट, इंट्रा-ऑपरेटिव मैनेजमेंट और पोस्ट-ऑपरेटिव केयर। सर्जरी 1 जुलाई को हुई, जो तीन घंटे चली। लेप्रोस्कोपिक तकनीक से मां की किडनी निकाली गई और बेटे को प्रत्यारोपित की गई।
डॉक्टरों की मेहनत और टीमवर्क से हुआ सफल ट्रांसप्लांट
इस सर्जरी में कई विशेषज्ञों की टीम ने अहम भूमिका निभाई, जिनमें डॉ. रितेश बनोडे (नेफ्रोलॉजिस्ट), डॉ. पद्मिनी, डॉ. अर्पण चौधरी, डॉ. मानस, डॉ. दीप जैन, डॉ. दीप्ति सक्सेना शामिल थे। ट्रांसप्लांट के बाद सचिन को ICU में विशेष निगरानी में रखा गया और मां को एक हफ्ते बाद छुट्टी दी गई।
अब जिंदगीभर रहेगी सावधानी की ज़रूरत
डॉक्टरों के अनुसार, सचिन को अब नियमित रूप से दवाइयां लेनी होंगी। भीड़-भाड़, धूल-मिट्टी और संक्रमण से बचाव जरूरी होगा। साथ ही मास्क का उपयोग और हाइजीन बनाए रखना अनिवार्य होगा।
आयुष्मान योजना बनी सहारा
सचिन का पूरा ट्रांसप्लांट आयुष्मान भारत योजना के तहत पूरी तरह मुफ्त हुआ। प्राइवेट अस्पतालों में इसी तरह के ट्रांसप्लांट की लागत 5 से 8 लाख रुपए होती।
मां का आशीर्वाद, बेटे की नई शुरुआत
डिस्चार्ज के समय भावुक माहौल था। सचिन ने डॉक्टरों के पैर छूकर आभार जताया और कहा – “सरकारी अस्पताल मेरे लिए वरदान साबित हुआ है।” मां ललिता ने भी कहा कि सरकारी अस्पताल में ही हमारे बेटे को नया जीवन मिला है।
यह इंदौर के सरकारी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में हुआ दूसरा सफल किडनी ट्रांसप्लांट है। अस्पताल के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने बताया कि जल्द ही चार और ट्रांसप्लांट वेटिंग में हैं, जो SOTO की प्रक्रिया के तहत पूरे किए जाएंगे।
इंदौर स्वास्थ्य समाचार
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