
17 साल पहले महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम धमाके के केस में एनआईए की विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में मुख्य आरोपी रहीं पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित समेत सातों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने माना कि मामले में सबूतों की कमी है और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा है।

क्या कहा कोर्ट ने?
विशेष न्यायाधीश ए.के. लाहोटी ने कहा कि जांच एजेंसी यह साबित नहीं कर सकी कि विस्फोटक से भरी बाइक साध्वी प्रज्ञा की थी। साथ ही, यह भी साबित नहीं हुआ कि आरडीएक्स कर्नल पुरोहित ने उपलब्ध कराया या बम तैयार किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और न्याय नैतिकता पर नहीं, सबूतों पर आधारित होता है।
जांच में क्या खामियां रहीं?
कोर्ट ने जांच एजेंसियों की लापरवाही की ओर इशारा करते हुए कहा कि घटनास्थल से फिंगरप्रिंट नहीं लिए गए और पंचनामा भी सही तरीके से नहीं किया गया। साथ ही, बाइक का चेसिस नंबर भी रिकवर नहीं किया गया, जिससे यह पुष्टि नहीं हो सकी कि वाहन साध्वी प्रज्ञा की थी।
कब हुआ था धमाका?
29 सितंबर 2008 को मालेगांव में धमाका हुआ था जिसमें छह लोगों की मौत हो गई थी और करीब 95 लोग घायल हुए थे। इस मामले में पहले महाराष्ट्र ATS ने जांच की थी, फिर 2011 में केस NIA को सौंपा गया। चार्जशीट 2016 में दाखिल हुई, लेकिन सबूतों की कमजोरी के कारण आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सका।
प्रतिक्रिया क्या रही?
साध्वी प्रज्ञा ने फैसले के बाद कहा कि उन्हें एक साजिश के तहत फंसाया गया और भगवा को बदनाम करने की कोशिश हुई। वहीं, कर्नल पुरोहित ने न्याय व्यवस्था पर विश्वास जताया। पीड़ित पक्ष ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट में अपील की बात कही है।
सरकारी सहायता के आदेश
कोर्ट ने मृतकों के परिवारों को 2-2 लाख रुपए और घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि धमाका हुआ था, यह तथ्य स्थापित है, इसलिए पीड़ितों को मुआवजा मिलना चाहिए।
मालेगांव ब्लास्ट केस में न्यायालय का यह फैसला एक बार फिर से हमारी न्याय प्रणाली की चुनौतियों और लंबी प्रक्रियाओं को उजागर करता है। जहां आरोपी सत्रह वर्षों तक कानूनी लड़ाई में उलझे रहे, वहीं पीड़ितों को भी आज न्याय अधूरा महसूस हो रहा है। यह मामला न केवल जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है बल्कि सिस्टम में सुधार की आवश्यकता की ओर भी इशारा करता है।
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