
प्रो. अजहर हाशमी का निधन: प्रख्यात कवि और व्यंग्यकार प्रो. अजहर हाशमी का राजस्थान में अंतिम संस्कार हुआ। जानिए उनके जीवन, साहित्यिक योगदान और रतलाम से जुड़ी यादों के बारे में।
प्रोफेसर हाशमी का राजस्थान में अंतिम संस्कार

रतलाम की साहित्यिक दुनिया को गहरा झटका देते हुए, प्रसिद्ध साहित्यकार, चिंतक और व्यंग्यकार प्रो. अजहर हाशमी का मंगलवार शाम निधन हो गया। वे 75 वर्ष के थे और पिछले एक माह से अस्वस्थ चल रहे थे। उन्हें इलाज के लिए रतलाम स्थित आरोग्यम हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था। मंगलवार शाम 6 बजकर 8 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। फेफड़ों में संक्रमण और प्रोस्टेट से जुड़ी समस्याओं के कारण उनका इलाज चल रहा था।
बुधवार सुबह उन्हें राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिड़वा गांव में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में रतलाम के कई प्रतिष्ठित लोग शामिल हुए, जिनमें वरिष्ठ पत्रकार आरिफ कुरैशी, तुषार कोठारी, एडवोकेट संतोष त्रिपाठी और प्रेस क्लब अध्यक्ष मुकेश गोस्वामी जैसे नाम प्रमुख हैं।
साहित्यिक दुनिया को अपूरणीय क्षति
प्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री चेतन्य काश्यप ने प्रो. हाशमी के निधन पर शोक जताते हुए उन्हें ‘मालवा का गौरव’ और ‘गीतों के राजकुमार’ कहा। उन्होंने कहा, “हाशमी जी से रतलाम की पहचान थी। वे एक सहज, सरल और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी लेखनी ने देशभर के साहित्य प्रेमियों को प्रभावित किया।”
प्रो. हाशमी कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय संचालक रहे। वे हर धर्म की बातों को सरलता से लोगों तक पहुंचाने की कला रखते थे। उनके विचारों में सामाजिक, धार्मिक और मानवीय मूल्य हमेशा प्रमुख रहे।
रचनात्मक यात्रा और लोकप्रिय कविताएं
प्रोफेसर अजहर हाशमी की कविताएं आज भी जनमानस के बीच जीवित हैं। “मुझे राम वाला हिंदुस्तान चाहिए” जैसी रचना ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। इसके अलावा, बेटी बचाओ अभियान की प्रेरणा देने वाली उनकी कविता को भी राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।
उनकी लेखनी न केवल संवेदनशीलता को दर्शाती थी, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जगाने का माध्यम बनी। वे मालवा क्षेत्र के उन गिने-चुने साहित्यकारों में से एक थे, जिन्होंने साहित्य को मंचीय लोकप्रियता के साथ-साथ गंभीर पाठक वर्ग में भी मान्यता दिलाई।
सम्मान और उपलब्धियाँ
हाशमी जी को कई मंचों पर सम्मानित किया गया। उन्होंने कई कवि सम्मेलनों की अध्यक्षता की और नवोदित लेखकों का मार्गदर्शन किया। रतलाम के सांस्कृतिक आयोजनों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता और भारतीय परंपराओं के सशक्त प्रवक्ता थे।
अंतिम संस्कार में उमड़ा जनसैलाब
उनके अंतिम संस्कार में राजस्थान और मध्यप्रदेश से सैकड़ों लोग पहुंचे। उनकी सरलता और अपनापन सभी के दिलों में था। हर कोई भावुक था क्योंकि हाशमी जैसे व्यक्तित्व का जाना एक युग का अंत था।
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