
भारत से सैन्य संघर्ष में हार के बाद पाकिस्तान ने दुनिया में अपनी छवि सुधारने के लिए बिलावल भुट्टो के नेतृत्व में डेलीगेशन भेजे हैं। क्या यह कूटनीतिक चाल असरदार होगी?
भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में बढ़े सैन्य तनाव के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की, जिससे क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया।
6 से 7 मई की रात हुई भारत की सैन्य कार्रवाई के बाद चार दिन तक चला सीमावर्ती संघर्ष पाकिस्तान के लिए भारी साबित हुआ। न केवल उसे सैन्य मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ा, बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत की आक्रामक राजनयिक रणनीति ने उसे घेरना शुरू कर दिया।
भारत ने आतंकवाद को लेकर दुनिया के 33 देशों में अपने बहुदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेजे। इनका उद्देश्य था—दुनिया को यह बताना कि पाकिस्तान की ज़मीन से अब भी आतंकी गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं। भारत की इस कार्रवाई ने पाकिस्तान की छवि पर गहरा असर डाला है।
अब पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार भी उसी राह पर चलते हुए अपना राजनयिक मोर्चा खोल चुकी है। सरकार ने पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो के नेतृत्व में डेलीगेशन भेजे हैं, जिनका मुख्य मकसद है—दुनिया को यह समझाना कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ है और भारत की कार्रवाई अनुचित थी।
बिलावल की यह डिप्लोमेसी उनकी क्षमता की अग्निपरीक्षा भी बन गई है। पहले ही राजनीतिक संकटों में घिरे पाकिस्तान के लिए यह प्रयास ‘छवि सुधारने की अंतिम कोशिश’ मानी जा रही है। यदि यह पहल विफल होती है, तो पाकिस्तान को न सिर्फ वैश्विक मंच पर शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी बल्कि आर्थिक मदद के दरवाजे भी बंद हो सकते हैं।
बिलावल भुट्टो के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल दुनिया के प्रमुख देशों में जाकर यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान अब एक जिम्मेदार राष्ट्र है। वे यह भी तर्क दे रहे हैं कि भारत की कार्रवाई ‘यूनिलेटरल’ और आक्रामक थी। लेकिन क्या दुनिया इसे स्वीकार करेगी?
विश्लेषकों का मानना है कि भारत की ओर से पहले कदम उठाने और आतंकवाद के मुद्दे को ठोस प्रमाणों के साथ रखने से पाकिस्तान की डिप्लोमैसी कमजोर स्थिति में है। बिलावल के पास अनुभव है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सिर्फ शब्दों से भारत की कार्रवाई का जवाब देना बेहद कठिन होगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात और स्पष्ट कर दी है—अब कूटनीति केवल बातचीत का खेल नहीं रही। अब यह छवि, रणनीति और तत्परता का खेल है, जिसमें भारत वर्तमान में बाज़ी मारता दिख रहा है।
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